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पी .एन.जे. फिल्मस के बैनर तले बनी हिन्दी फिल्म  “आख़िर कब तक?” आज 14 अक्टूबर को सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शित हो चुकी हैं, जबकी बिहार झारखण्ड और बंगाल में 21अक्टूबर को प्रदर्शित की जायेगी।21वीं सदी में ग्लोब्लाइजेश के युग में भी हमारा समाज आज भी कथनी और करनी में कितना फर्क रखता हैं। इसका उदाहरण हैं दहेज़ प्रताड़ण इसके परिणाम स्वरूप होती है, निर्माता लेखक निशिकान्त झा  ने बताया फिल्म आख़िर कब तक ? के बहाने हमारे दोहरे माप दण्ड और दोगली मानसिकता को दिखाया है।आज भी हमारे < span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: #222222;">समाज में लोग दहेज़ प्रताड़णा जैसी घरेलू हिंसा को अन्जाम देते हैं, एक तरफ बेटी बचाओ,के लिए सरकार भरपूर प्रयास कर रही हैं।दूसरी तरफ समाज के छोटी मानसिकता के लोग महिलाओं को आज भी दहेज़ के लिए प्रताड़ित करते हैं। इस फिल्म में दहेज़ प्रताड़णा के ख़िलाफ़ आवाज उठाई गयी हैं।और समाज जागरूक करने का प्रयास किया गया है , फिल्म के मुख्य कलाकार हैं, मनीषा सिंह ,विनय राणा ,आदित्य मोहन , राम सुजान सिंह ,विनोद मिश्रा, मेहनाज श्रॉफ जितेंद्र शुक्ला इत्यादि हैं।

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यह प्रस्तुति महज एक फिल्म पर नही है ,यह आगाज जुल्म और सितम के ख़िलाफ़, जिसे जान कर भी हम अनदेखा करते रहे है ,इस  फ़िल्म के निर्देशक है  मिथिलेश अविनाश।जाति धर्म के लफ़रो से अलग एक सर्वथा व्यवहारिक बात को लेकर निशिकांत झा की फ़िल्म आगे बढ़ती है। लाख तरक्की के बाद भी हमारा देश, यहां का हर समाज,हर खेमा दहेज के शिकंजे से अब तक जकड़ा हुआ है।तरीके और स्वरुप भले ही बदले हुए है पर दहेज का ना लेना बंद हुआ है उसके लिए दी जानेवाली प्रताड़ना ही ख़त्म हुई है।लेकिनआखिर कब तक?” सिर्फ सैद्धांतिक रूप से दहेज़ का विरोध नहीं करती है बल्कि इसके मूल्य कारणों पर भी ध्यान केंद्रित करती है।अब दहेज़ को लेकर सिर्फ लड़की या लड़की पक्ष ही प्रताड़ित नही होते, इसका शिकार वर पक्ष भी हो रहे है।इन सारी विसंगतियों को खुलासा करती हैं , फ़िल्म आख़िर कब तक?।रूप के गीत,जयंत आर्यन का संगीत और डी. के शर्मा का छायांकन सुंदर है।रानू पांडे का आईटम गीत भी लुभावना है, जिसके नृत्य निर्देशक संतोष सर्वदर्शी है।हीरा यादव का एक्शन है।जबकि प्रचारक अखिलेश सिंह है।